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इंटरनेट ऑफ़ अंडरवाटर थिंग्स (IoUT)-अंडरवाटर सेंसर नेटवर्क संशोधन का नया परिचय

इंटरनेट ऑफ़ अंडरवाटर थिंग्स (IoUT)-अंडरवाटर सेंसर नेटवर्क संशोधन का नया परिचय

यूनिवर्सिटी न्यूज़
पानी के भीतर के वातावरण में ध्वनि प्रसार के उपयोग के तहत संदेश भेजने और प्राप्त करने की तकनीक को ध्वनिक संचार के रूप में जाना जाता है। अंडरवाटर सेंसर नेटवर्क में वाहनों और सेंसर की संख्या होती है जो सहयोगी निगरानी और डेटा संग्रह कार्यों को करने के लिए एक विशिष्ट क्षेत्र में तैनात होते हैं । परंपरागत रूप से समुद्र तल की निगरानी के लिए, समुद्र विज्ञान सेंसर को एक निश्चित स्थान पर डेटा रिकॉर्ड करने और कार्य पूरा होने पर उपकरणों को पुनर्प्राप्त करने के लिए तैनात किया जाता है।पारंपरिक दृष्टिकोण का प्रमुख नुकसान विभिन्न छोरों के बीच संवादात्मक संचार की कमी है, जिस वजह से  किसी भी मिशन के दौरान रिकॉर्ड किया गया डेटा कभी नहीं मिल सकता है, और किसी भी विफलता के मामले में रिकॉर्ड किया गया डेटा नष्ट हो सकता है। पानी के भीतर ध्वनिक चैनलों कि तीन मुख्य विशेषता है: फ्रीक्वेंसी - और सिग्नल की दूरी-निर्...
विशेष लेख : श्री लक्ष्मणराव काशीनाथ किर्लोस्कर जयंती, कलर ब्लाइंड थे फिर मैकेनिकल इंजीनियर बने, किर्लोस्कर ग्रुप के संस्थापक, 100 वर्षो पहले ही मेक इन इंडिया ला चुके थे

विशेष लेख : श्री लक्ष्मणराव काशीनाथ किर्लोस्कर जयंती, कलर ब्लाइंड थे फिर मैकेनिकल इंजीनियर बने, किर्लोस्कर ग्रुप के संस्थापक, 100 वर्षो पहले ही मेक इन इंडिया ला चुके थे

उद्योग जगत, मनोरंजन, राष्ट्रीय
रायपुर. श्री लक्ष्मणराव काशीनाथ किर्लोस्कर जी का जन्म 20 जून 1869 बेलगाम, तब बंबई में हुआ था। बचपन से इन्हे पेंटिंग का बहुत शौक था, वर्ष 1885 में इन्हे जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट, बॉम्बे में एडमिशन मिला था पर 2 वर्ष बाद वो आंशिक रूप से अंधे हो गए थे. इस वजह से इन्हे कॉलेज से बेदखल कर दिया गया था. श्री किर्लोस्कर जी ने हार नहीं मानी और मैकेनिकल ड्राइंग की पेंटिंग्स बनाना जारी रखा इनमे रंगो को भरने की जरुरत नहीं होती थी, फिर इन्होने मैकेनिकल स्कूल में दाखिला लिया और इनकी मैकेनिकल ड्राइंग की कला और निपुणता को देख कर इन्हे उसी स्कूल में पढ़ाने की नौकरी भी मिल गयी। फिर इन्होने बेलगांव में एक सी छोटी साइकिल की दुकान खोली और फिर यहां से उनका जीवन बदल-सा गया। वे 700 रुपये - 1000 रुपये में साइकिल बेचने लगे व 15 रुपये में सिखाने भी लगे। 19वी सदी में एक साइकिल, मोटर कार के बराबर मानी जाती थी। जिस सड़...