Saturday, September 18संस्थापक, प्रधान संपादक, स्वामी श्री नवनीत जगतरामका जी
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142वीं जयंती 31 जुलाई 2021 के मौके पर खास पेशकश प्रेमचंद की कहानियों में भारत दर्शन कितना उजला, कितना धुंधला?

नवाब वह होता है, जिसके पास कोई मुल्क हो, हमारे पास मुल्क कहां ?‘‘ बे-मुल्क भी नवाब होते हैं ? ‘‘ यह किसी कहानी का नाम हो जाए तो बुरा नहीं, मगर अपने लिए यह घमंड पूर्ण है। चार पैसे पास नहीं और नाम नवाबराय । इस नवाबी से प्रेम भला, जिसमें ठंडक भी है, संतोष भी। अपनी मुसीबतों पर इस तरह हंसते हुए प्रेमचंद जी ने अपने नवाब को निरर्थक ठहराया।

हिंदी साहित्य के कालजयी पत्रिका ‘‘हंस‘‘के मई, 1937 के अंक में प्रकाशित सुदर्शन जी और प्रेमचंद जी के बीच हुए संवाद तब के वक्त में हुआ रहा जब 1909 के दौर में प्रेमचंद की कहानी सोज़े वतन, ज़माना प्रेस, कानपुर की प्रतियां अंग्रेज सरकार ने बगावती लेख मानकर जप्त कर ली थीं। तब उर्दू अख़बार ज़माना के संपादक मुंशी दयानारायण निगम जी ने नवाबराय नाम की जगह प्रेमचंद के नाम से लिखना सुझाये थे। और उसी दौर में सुदर्शन जी ने प्रेमचंद से सवाल किये थे कि आपने नवाबराय नाम क्यूं छोड़ दिया ? प्रेमचद का यह तीसरा नामकरण था। जन्म के बाद डाॅक मुंशी पिता श्री अजायबराय श्रीवावस्त ने अपने इस पुत्र का नामकरण धनपतराय किया था।

पितृविहिन धनपत बचपन से धन के अभाव में मुफलिसी और तंगी से घिरे रहे । इसके बावजूद खुद को नवाब से नवाजते हुए आखिर में प्रेमचंद बनकर इतनी शोहरत और फख्र हासिल किये जो पुरी दुनिया में नायाब मिसाल है।’’ बूढ़े ने पगड़ी उतार कर चैखट पर रख दी और रो रोकर बोलने लगा कि हूजूर, एक निगाह देख लेें. बस एक निगाह। लड़का हाथ से चला जाएगा हजूर. सात लड़के यही एक बचा है हूजूर‘‘’ उनकी एक कहानी का प्रसंग अंश प्रेमचंद के लेखन में समाई व्यावहारिक शैली में उर्दू की स्पष्ट छाप नजर आती है, सरल और मुहावरेदार भाषा सहित। साल 1880 से 1936 के बीच के कालखंड में लिखीं प्रेमचंद की सभी कहानी, उपन्यास, और नाटक क्रमशः गोदान, सेवासदन, कर्मभूमि, रंगभूमि, गबन, प्रेमाश्रम, निर्मला वरदान, कायकल्प, सप्तसुमन, नवनिधी, प्रेमपचीसी, प्रेमसरन, पंच परमेश्वर, संग्राम, प्रेम की बेदी, कर्बला आदि रचनाओं में जहां मानव जीवन के यथार्थ समस्याओं का संजीदगी से चित्रण किया गया है, वहीं बाल-विवाह, दहेज कुरीति रिश्वत भ्रष्टाचार, साहूकारी, गरीबी, लाचारी, भूख तड़पन जेैसी संवेदनशील हावभाव से पढ़ने वाले ना केवल सिहर उठते हैं और शर्मशार होना भी महसूस करने लगते हैं।

नाटकों में राष्ट्र प्रेम और विश्व बंधुत्व का संदेश देने में भी प्रेमचंद कामयाब हैं। इस तरह प्रेमचंद जी की समसामायिक और विषम आर्थिक परिस्थितियों का क़िताबी दस्तावेज देश दुनियां के साहित्य संसार में धरोहर के बतौर विद्यमान है। धनपत के जन्म के वक्त श्री अजायबराय को बिलकुल इल्म नहीं रहा होगा कि डाॅक मुंशी पिता के इस पुत्र को भारतीय डाॅक महकमे द्वारा प्रेमचंद जी के जन्म के शतक वर्ष 1980 में 30 पैसे का डाॅक टिकट जारी कर सम्मानित किये जाने की औपचारिकता का निबाह किया जावेगा वहीं 21वीं सदी के दौर में फिल्मी पर्दें पर फूहड़ता पूर्वक कमर मटकाने वाले एक फिल्मी कलाकार को उसकी शोहरत, दौलत, और उसके ताकत के बल पर उसे भारत रत्न से नवाजा जावेगा। कहां 30 पैसे का डाॅक टिकट और कहां भारत रत्न का तमग़ा ? तराजू पर यक्ष प्रश्न ? प्रेमंचद जी कहानियों और रचनाओं में भारत दर्शन के परिवेश में तब के दौर के किसानों की दयनीय दशा, सामाजिक बंधनों में जकड़ी तड़पती नारियों की खामोश चीखें, वेदनाए, जाति वर्ण व्यवस्थाओं का खोखलापन, दलितों की पीड़ा, साहूकारों जमींदारों का शोषण आदि की तस्वीरें आज के चमकते लोकतंत्र में कितनी ज्यादा उजलीं और कितनी धुंधंली के सवालात का जवाब तलाशने का आग्रह सुधि पाठकों से है।

बहरहाल सालों साल उमरदराज हो रहीं प्रेमचंद की रचना पंच परमेश्वर पर बेबाकी ख्याल एक छात्रा के शब्दों में…. मैं बिलासपुर की सौम्या तिवारी, 12वीं क्लास की स्टुडेंट हूं। मैं मुंशी प्रेमचंदजी की कहानियों से बहुत प्रेरित भी हूं। प्रेमचंद जी को हिन्दी साहित्य का शेक्सपियर भी कहा जाता है। इनकी कहानियों में मेरी सबसे प्रिय ‘‘ पंच परमेश्वर‘‘ बचपन के दो मित्रों की दिलचस्प कहानी है, पंच अलग और जुम्मन शेख की घनिष्ठ मित्रता का उल्लेख किया गया है। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि न्याय सबके लिए एक समान है, न्याय के सामने कोई गरीब, छोटा, बड़ा, उंच, नीच का व्यक्ति नहीं होता। आज भी हमारा न्याय बुद्धि की कसौटी बना हुआ है। कुछ सालों पहले लोग ईमानदार हुआ करते थे न्याय के लिए एकात्मता के लिए आज के ज़माने में कुरसी में बैठें हुए लोगों के कारन गवाह मिटाए जाते हैं जिसका मुख्य कारण समाज में बढ़ता भ्रष्टाचार है। हम आम आदमियों को जागरूक बन्ना होगा अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा। जितनी जागरूकता होगी उतना ही ज्यादा समाज में परिवर्तन होगा जिससे भ्रष्टाचार कम होगा और लोगों को न्याय मिलेगा। इसी कड़ी में रायगढ़ की एक औेर स्टुडेंट से प्रेमचंद की रचनाओं के बारे में जानने के लिए मुखातिब हुआ। 18 दिसंबर 2004 की पैदाईशी और फिलहाल अंग्रेजी मीडियम स्कूल में दसवीं की स्टुडेंट ज़किया हुसैन बताती हैं उनकी मां रज़िया निखालिस घरेलू हैं जबकि अब्बा हूजुर मुब्बस्सिर हुसैन का खाना खिलाने का कारोबार है। प्रेमचंद जी को सुपर कथाकार और उनकी लिखी ईदगाह ज़किया अपनी पसंदीदा कहानी को बचपन में पढ़ना बताती है।

इस कहानी में मां का नया रूप का वर्णन किया गया है जन्म देने वाली ही मां नहीं होती है बल्कि पालन करने वाली स़्त्री भी मां कहलाती है। कहानी में हामिद की मां की भूमिका निभाने वाली उसकी दादी निभा रही है, जबकि दादी कहानी के प्रारंभ और आखिर में आती है। लेकिन इसके बावजूद बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। हामिद कहानी के अंत में अपने बालपन शोख से अपनी बूढ़ी दादी में भी बचपना ले आता है। प्रेमचंद की अत्यंत रोचक और कौतूहलभरी यह कहानी है जो बाल मनोविज्ञान को समझते हुए बालमन के प्रति संजीदा होने का बखूबी संदेश पढ़नेवालों के अंतर्मन में पहुचाने में सफल है। पीयूष शमलानी 12वीं कक्षा के स्टुडेंट हैं, पीयूष भी प्रेमचंद की कहानियों के मुरीद हैं। प्रेमचंदजी को सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार बताकर उनकी कहानी मंत्र को अपनी प्रिय कहानियों में अव्व्ल नंबर में शामिल किये हुये हैं। पीयूष के मुताबिक इस कहानी में बहोत अच्छी सीख इंसानियत के भाव के अनुसार जीने का संदेश है। कहानी में अस्पताल के बंद होने का समय बताकर एक डाॅक्टर ने एक मरीज का इलाज करने से मना कर देता है कुछ समय बाद उसकी डाॅक्टर के बेटे को सांप ने डस लिया। सांप का जहर निकालने का इलाज पूरे गांव में उसी मरीज के पास था जिसे डाॅक्टर ने इलाज करने से मना किया हुआ था लेकिन यह जानकार उस बूढे़ व्यक्ति को नींद नहीं आई उसे इंसानियत की परवाह थी और वह इलाज के लिए स्वतः उस डाॅक्टर के घर पहुंच जाता है।

इंसानी भाव को झझकोर देने वाली यह कहानी से जाहिर है कि प्रेमचंद के जमाने में लोगों में गरीब अमीर, अच्छा बुरा होने का बंधन नहीं होता था एकदूसरे की सहायता एक मानवीय धर्म होता था। लेकिन आज जमाना बदल गया सब अपने मतलब के लोग हो गये हैं।प्रेमचंद की सीख समझनी होगी कि इसी दुनियां को बेहतर दुनिया बनाने के लिए इंसानियत का रिश्ता सबसे उंचा रिश्ता बनाने की सोच मजबूत करनी होगी हम सभी को। मैं एक मजदूर हूं, जिस दिन मैं कुछ लिख ना लूं उस दिन मुझे रोटी खाने का बिलकुल भी हक़ नहीं है। प्रेमचंद जी के इस कहे बोल को दोहराते हैं रायगढ़ जिले के बरमकेला के रहने वाले शत्रुध्न पटेल फिलहाल जानकी बी.एड के छा़त्र हैं। प्रेमचंद की कहानी कफ़न को यथार्थवादी होने का परिचायक बताते हुए शत्रुध्न के अनुसार आर्थिक विषमता वाले पात्र धीसू, माधव और बुधिया मेहनत मजदूरी करने के बाद भी रोटी का जुगाड़ करने में संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं और अंततः टूट बिखर कर आलसी हो जाते हैं।

बुधिया गर्भवती है जचकी की पीड़ा से कराहती है मदद चाहती है। बाप बेटे भुने हुए आलू खाने में मशगुल हंैं बुधिया की गुहार पुकार को अनदेखा इस लिए उसके पास नहीं जाते हैं कि एक अकेला भुना हुआ पुरा आलू खा जाएगा।भरपेट आलू खाने से दोनों को नींद आ जाती है सुबह उठकर देखने जाते हैं तब तक बुधिया मर गई होती है। बुधिया के कफ़न के लिए गांव वालों से मिले सहायता राशि से शराब पीने में मस्त हो जाते हैं यह सोच कर बुधिया के कफ़न का इंतजाम देरसबेर पड़ोसी लोग कर ही देगें। मजदूरों के शोषण से धीसू माधव को निकम्मा बनने पर मजबूर करती है। भूख के सामने मनुष्य कैसे पशुतुल्य हो जाता है यह सोचने पर विवश करती है प्रेमचंद की कहानी कफ़न।

सुरेंद्र वर्मा

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