Monday, November 29संस्थापक, प्रधान संपादक, स्वामी श्री नवनीत जगतरामका जी
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पुलिस स्मृति दिवस : खाकी के भीतर धड़कती सांसो से ही हमारी जान में जान है

प्रायः पुलिस कर्मी को अपना फ़र्ज पूरा करते देखते रहने के बावजूद अक्सर उनकी आलोचनाएं ज्यादा करते हैं, उन पर आरोप भी मढ़ते हैं जिनमें से कुछ सच लेकिन अधिकांशतः गलत होते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि ये लोग कितना कठिन काम करते हैं। आज के दिन हमें उनकी सेवा को उस नजरिये से देखने की जुरूरत है कि हमारी पुलिस आम लोगों की जान माल की रक्षा करने में अपनी जिंदगी से किस तरह से सहर्ष समझौता कर लेते हैं और वक्त-ब-वक्त अपनी जिंदगी न्यौछावर करने से भी नहीं चूकतेश्। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जी के इस उद्गार को पुलिस के लिए पहला सम्मान माना जा सकता है। मौका था जयपुर राजस्थान में पुलिस स्मारक के लोकार्पण का और तारीख थी साल 1963 के 05 नवंबर का।

बहरहाल अगली कड़ी में आज पुलिस स्मृति दिवस के मौके पर हमर छत्तीसगढि़या पुलिस को सब ले बढि़या होने की तर्ज पर सम्मान करने की जुरूरत और जिम्मेदारी हम छत्तीसगढ़वासियों को महसूस करना चाहिए। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल और डीजीपी श्री डी.एम.अवस्थी ने गुजिश्ता 32-33 महिनों के अब तक के कार्यकाल में प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली में सब्बो बर एकेच नंबर की सुविधा को पहले से ज्यादा सशक्त बनाते हुए जिस तरह से पुलिस को लोक-हितैषी बना रहे हैं, प्रशंसा की जानी चाहिए।

मिसाल के तौर पर श्री दिपांशु काबरा आईजी को जनसंपर्क-कमिश्नर के साथ साथ ट्रांसपोर्ट अपर कमिश्नर का दायित्व सौंपकर प्रदेश की जन-योजनाओं को देशभर में प्रचार प्रसार की महती जिम्मेदारी देकर आईपीएस कैडर के प्रति अठूट भरोसा जाहिर करने तथा ट्रांसपोर्ट के अल्प कार्यकाल में आम लोगों को ड्रायविंग लायसेंस घर की चौखट में पहुंचा कर शासन की छबि को निखारने के अद्भुत पहल से श्री काबरा के  शख्सियत के स्वर्णिम होने के गुणों से आमलोग वाकिफ हो रहे हैं।

रायगढ़ के कार्यकाल में कटे फटे होंठ, विकृत हुए चेहरों की प्लास्टिक सर्जरी अपने खुद के संपर्को से चैरिटी कार्य आप भी लाभान्वित ग्रामीणों केे बीच मिसाल बना हुआ है। वहीं लीक से हटकर श्री शेख आरिफ हुसैन को एसीबी-ईओडब्ल्यू में आला ओहदा अता कर जिस तरह असरदार किये और प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त करने की दिशा में प्रदेश के रिश्वत खोरों अफ़सरों और कर्मियों की धरपकड़ करने में जो कोशिशें दिखी हैैंं, जो नतीजे मिले हैं, काबिल-ए-तारीफ़ है। भ्रष्टाचारी एक पगड़ीवाले बाबा के आज अपने ही मातहतों तथा आम लोगों से मुंह लुकाते फिरते रहना शेख साहब की ही दबंगता का नतीजा है।

रायपुर के एक थाने के अंदर मारपीट करने की घटना से एसएसपी को रातोंरात हटाने और रायगढ़ के दोहरे हत्याकांड में नाबालिगों को संदेहास्पद मुलजिम बनाए जाने के खिलाफ जनआक्रोश का सम्मान करते एसपी के कथित निष्कर्ष के विरूद्ध एसआईटी के जरिये पारदर्शिता दिखाने की कवायद भी सरकार की तरफ से पुलिस को सम्मान दिये जाने की दिशा में ये मिसाल सराहनीय है।

दूसरी तरफ मृदुल मिजाज और क्षीर से नीर अलग करने की अकल्पनीय कार्यशैली से एसएसपी श्री दीपक झा बिलासपुर जिले के आम अभिभावकों के बीच बेहताशा लोकप्रियता हासिल करते नज़र आ रहे है। गुजिश्ता नेशनल स्पोर्ट्स डे के मौके पर पुलिस ग्राउंड में  109 साल से भी अधिक वक्त में हॉकी खिलाडि़यो के परिजनों और वयोवृद्ध खिलाडि़यों को शहर के गली-कोलकियों में ढृढ ढृढ कर उन्हें खेल सम्मान देकर शहर खेल जगत के लिए नायाब मिसाल बने भी हैं दीपक झा। बगैर उफ्फ किये सीलन भरी जमीनों और मिट्टी के दीवालों से घिरे खंडहरनुमा खपरैल मकानों में कांस्टिबिल हेड कांस्टेबिल अभी भी अपने बीवी बच्चों के साथ गुजर बसर करते देखे जा सकते हैं।

और वक्त के घड़ी में चौबीस गुना सात की दर से समर्पित लोक सेवा के जज्बों की तारीफ हासिल किये जाने के हक़ पुलिस वालों को भी देना चाहिए। बेहद ही सीमित साधनों संसधानों की टीस से भरे होने के बावजूद इनकी कार्य गुणवत्ता का बखान भी किया जाना चाहिए ऐसी स्थिति में जब पुलिस का नाम सुनते ही आम इंसानों के दिमाग में प्रताड़ना, कू्ररता, अमानवीय व्यवहार, रौब, उगाही, रिश्वत आदि कौंध उठता है, शायद यही वजह है कि द्विपक्षीय बोलचाल की भाषा में एक कहावत प्रचलित है कि पुलिस वालों की ना तो दोस्ती अच्छी और ना ही दुश्मनी ? अलबत्ता यह धारणा कायदे कानून पसंद उन नागरिकों के लिए मायने नहीं रखती है जो कि कानून का सम्मान करते हैं, पुलिस कर्तव्यों का सम्मान करते हैं कानून के दायरे में रहकर जीवन जीते हैं, ऐसी कोई गफलतबाजी नहीं करते जिससे उन्हें पुलिस की अनचाहे बदसूलकी का सामना करना पड़े।

देश के प्रत्येक राज्य का पुलिस बल उन बहादुर पुलिस वालों की स्मरण में आज स्मृति दिवस का आयोजन करता चला आ रहा है, जिन्होंने नागरिकों और इलाकों की रक्षा खातिर अपनी प्राणों की कुर्बानी दी है अथवा जख्मी जीवन जी रहे हैं। आज के परेडों में आम लोगों की शिरकत बहुत कम हुआ करती है, मीडिया वालों की भी मौजूदगी कम देखी जाती है। देश के 15 लाख से भी ज्यादा पुलिस कर्मियों के लिए मुकरर्र इस महत्वपूर्ण दिवस को मीडिया से भी कोई खास तवज्जो नहीं मिलती। फ़र्ज की बेदी पर जान कुर्बान करने वालों को जवानों को छुपा नायक करार दिया जाता है जबकि एकाध प्रतिकूलता की स्थिति की सुर्खियां बढ़ाचढ़ाकर एक मर्तबा नहीं बार बार परोसा जाता है दुखद पहलू यह भी है।

हम यहां दूरदर्शन में दिखाए गये न्यूज फूटेज़ का भी उल्लेख करना प्रासंगिक समझते हैं जब 11 सितंबर 2001 की घटना के फौरन बाद अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने देशवासियो और सदन को संबोधित करते हुए अपनी जेब से एक पदक निकालकर कर देश और दुनियां वालों को दिखाया । ये एक अमरीकी पुलिस कर्मी का पदक था जो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के हमले मंे सेवारत रहने के दौरान शहीद हुआ था। ये पदक राष्ट्रपति बुश को उस पुलिस कर्मी की माता जी ने तब सौंपा था जब राष्ट्रपति शहीद परिवार से मिलने घर गये हुये थे। राष्ट्रपति द्वारा पदक दिखाने और उस पुलिस कर्मी की सेवा का जिकर करने अमरीकी सदन के सभी सदस्यों ने उस पुलिसकर्मी की सेवा और संपूर्ण पुलिस बल के प्रति सम्मान, आभार और श्ऱद्धांजलि अर्पित की। इसके ठीक उलट हमारे पुलिस  कर्मी समाज से ठुकराए हुए, अपेक्षित सुख साधनों से वंचित और असुरक्षा की भावना के साथ थके हारे दिखाई देते हैं।

अगर वे ईमानदार हैं तो वे अकेले हैं, अगर वे शहीद होते हैं तो उनके मां-बाप को अकेले ही दुःख सहते है, भूले बिसरे हो जाते हैं, दूसरी तरफ यह सोचकर हैरानी भी नहीं होना चाहिए कि जब दुनियांदारी में निपुण कुछ पुलिस वाले अपने और अपने परिवार के सुरक्षित वर्तमान व भविष्य के लिए कर्तव्य निष्ठा समर्पण से खुद को रोकते हैं और कभी कभी तो देश और क्षेत्र की सुरक्षा शांति अपराध नियंत्रण के खिलाफ समझौता करने वालों की भी बहुतायक संख्या देखी जा सकती है।

आज का दिन पुलिस सेवा के लिए महत्वपूर्ण दिवस है,यह वो दिन है जब आम नागरिक, बच्चे, महिलाएं पुलिस की अच्छाईयों को नजदीक से जान सकें समझ सकें और सहयोग के लिए आमादा हो सकें। हम सबों के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि हम उन रास्तों को याद रखें जिन पर चलकर हमे ये मालूम हुआ है कि एक राष्ट्र के लिए हम कौन हैं और क्या हैं घ् गौरतलब है कि आज की तारीख में 66 साल पहले लद्दाख में भारतीय सेना और पुलिस के जांबाजों के रक्त से लिखी गई शहादत की गौरव गाथा को यादगार बनाने रखने के लिए 1960 से पूरे देश भर में भारतीय सेना सहित केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों की पुलिस द्वारा सन् 1960 से पुलिस स्मृति दिवस मनाये जाने की परंपरा स्थापित है। पुलिस पेंशनर्स फेमिली के अजयप्रताप सिंह सीनियर जर्नलिस्ट श्री अनिल रतेरिया, श्री भोजराम पटेल व्याख्यता, आरती स्वर्णकार न.पा.नि. मोनिका ईजारदार नोडल अधिकारी, अरूण कातोरे स्कूल संचालक समय समय पर से हुई बातचीत के अंश इस आलेख की बुनियाद हैं।

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