Tuesday, September 21संस्थापक, प्रधान संपादक, स्वामी श्री नवनीत जगतरामका जी
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नोबल कविगुरू रबिंद्रनाथ टैगोर की जयंती 07 अगस्त के मौके पर खास पेशकश

साल 1890 में बिलासपुर रेल्वे स्टेशन की बिल्डिंग ब्रिटिश हूकूमत के नुमांइदों के द्वारा बनाई गई है। यूरोपियन शैली में बनी इस बिल्डिंग के उपरी मंजिल में चढ़ने उतरने के लिए सीसम लकड़ियां की सीढ़ी का उपयोग अभी हाल के दिनों तक किया गया है। इसी बिल्डिंग की मुख्य दीवार में तत्कालीन डीआरएम श्री बनर्जी द्वारा कविगुरू रबिन्द्र्रनाथ टैगोर रचित एक कविता डिस्पले है । रायगढ़ की प्रख्यात शिक्षाविद् श्रीमति टुम्पा देवाशीष सरकार बताती हैं कि वो खुद बिलासपुर की हैं उनकी दिवंगत श्वसुर इसी रेल्वे विभाग में स्टेशन मास्टर रहे हैं, फलतः स्टेशन से गुजरना नियमित रहा है।

हिंदी बांग्ला और अंगे्रजी भाषा में लिखी इस कविता में छुपी भावनाओं को स्पष्ट करती हुई टुम्पा का कहना है कि श्री रबिन्द्र नाथ टैगोर द्वारा फाॅकी एक बहोत ही सुंदर भावनात्मक भरी हार्दिक श्ऱद्धांजलि है, अर्थ है भ्रम (छल)। कविता एक ऐसे वायदे के ईदगिर्द घूमती है, जिसे एक अनाम पति ने अपनी बीमार पत्नी बीनू से किया था….लेकिन उसे पूरा करने में समर्थ होने के बाद भी बेबस है, लाचार है। इसके अलावा वह स्थिति को नहीं बदल सकता है, क्योंकि उसकी पत्नी की मृत्यु इस भ्रम (छल) में हुई है कि उसके पति ने उसके मृत्यु के पहले ही उसकी अमृतमयी इच्छा को पूरी कर दी है, जिससे उसके जीवन के अंतिम दो मास सार्थक बन गये।

लेकिप पति ही यह जानता है कि स्वर्गीय पत्नी के भ्रम और छल का उसे जिंदगी पर्यन्त प्रायश्चित करना है बोझ उठाना है। इस फाॅकी कविता को हू-ब-हू प्रकाशित कर हम कविगुरू रबिंद्र नाथ टैगोर के साहित्य खजाने से एक अनमोल रतन हम अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

तेईस वर्षीय बीनू को जब बीमारी ने घेरा, डाॅक्टर और दवाईयों को सहना था बीमारी से भी अधिक कठिन, भिन्न भिन्न नाम, आकार प्रकार की, दवा की बोतलों और गोलियों ने जमा लिया था डेरा। डेढ़ साल इलाज उपरान्त भी जब वह हो गई अस्थि-पंजर, तब सलाह दी डाॅक्टरो ने-‘हवा पानी बदलने को, ऐसे हुई बीनू की प्रथम रेल यात्रा, शादी के बाद पहली बार ससुराल के घर से बाहर निकलना । संयुक्त परिवारके बंधनों में, घुटे-घुटे वातावरण में, खो ेरहा थाजीवन संगीत: कभी कभार की मुलाकातें,घुटी-घुटी सी हंसी, और दबी-दबी सी होती बातें । आज अचानक धरती जैसे नव वर-वधु का स्वागत करने, आन खड़ी हो धारण करके, पूरे नभ की ज्योति। बीनू की बड़ी-बड़ी बीमार आंखो में उमड़ रहे थे भाव ऐसे, देख लिया हो घूंघट हटानेपर, एक नूतन संसार जैसे। रेल के बाहर भिक्षा मांगते भिखारी, अपने डिब्बे से कुछ सिक्के निकाल कागज में लपेट भिखारियों की तरफ उछालती बीनू, लगता था अपनी खुशी को बाॅट रही है।

टूटी-फूटी गृहस्थी के दुखों को पीछे छोड़ हम चिरन्तन प्रेम की धारा में, मानो बहे जा रहे थे, बीनू की खुशी और दानप्रियता से विश्व प्रेम के भाव हमारी यात्रा में, मानों भरे जा रहे थे। बार-बार उसका तन-मन,ये सोच रोमांचित हो रहा था-आज मेरे प्रियतम हैं केवल मेरे, नहीं दूसरे रिश्ते-नाते हैं हमको घेरे। बिलासपुर स्टेशन से बदलनी थी गाड़ी। जल्दी जल्दी,उतरे । प्रतीक्षालय में बिताना छः घंटे मुझे लगा एक युग सा भारी। पर बीनू थी खुश, बोली-‘यह तो अच्छा है मौका‘ ।उसकी खुशी थी अपार, और यात्रा मानों एक बंसी की घुन, जिस पर थिरक रहा था, उस का तन-मन। उस के खुशी भरे हाव-भाव हो रहे थे, उसके आनन्द के साथ, एकाकार। प्रतीक्षालय क द्वार खोल, वह बोली-‘देखो, वह दौड़ती घोड़ा-गाड़ियां, उस घोड़े की शावक की भरी-भरी चिकनी देह, उसकी मां की आंखों से छलकता स्नेह। और देखो, उधरी सीधी ढलान वाले तालाब से लगा छोटे छोटे पौधों के झुरमुट में चारों तरफ से घिरा एक घर-क्या वह स्टेशन बाबू का घर है ?अहा। कितना सुंदर।

मैंने वेंिटंग रूम में बिस्तर बिछाया । बीनू को आराम से सोने को समझाया। और प्लेटफाॅर्म की कुर्सी खींच पास पढ़ने लगा एक अंग्रेजी उपन्यास। तीन घंटे में गुजर गई थी कितनी ही माल व यात्री गाड़ियाॅं। सहसा प्रतीक्षालय के अंदर से बीनू ने पुकारा-जरा अंदर आओ, तुम्हें कुछ है बताना। अंदर खड़ी थी एक हिन्दुस्तानी लड़की, उसने देखा मेरी ओर, सलाम किया और खड़ी हो गई प्लेटफाॅर्म पर आ एक स्तम्भ के सहारे। बीनू बोली-उसकाा नाम है रूकमणी। उधर कुॅए के पास वाली झोपड़ी की कतारों में उसका घर, उसके पति है कुली। इसी स्टेशन पर कुछ वर्ष पहले उनके गाॅव में आन पड़ी मुसीबत भारी, अत्याचारी जमींदार ने छीनी जमीन सारी, न रहा ठौर-ठाॅव। मैंने हंसकर कहा गाड़ी आकर निकल जाएगी, संक्षेप में बताने से क्या, बात नहीं बन पाएगी। न ही होगी हानि । बीनू गुस्से से भंवे तान कर बोली-क्यों संक्षेप में सुनाउं ? आफिस के लिए थोड़े है जाना, फिर क्यूं है पूरी सुनने में परेशानी। तो अपना अंग्रेजी उपन्यास छोड़ मैंने सुनी उस स्टेशन कुली की पूरी कहानी।

कुली की बेटी की होनी थी शादी दहेज में देने थे कंगन और चूड़ी कैसे जुटाए इनके लिए पच्चीस रूपये रूकमणी को थी यही चिन्ता भारी। और बीनू ट्रेन में चढ़ने से पहले देकर पूरे पच्चीस रूपये चाहती थी हरना रूकमणी की चिन्ता सारी। ये कैसी मूर्खता। कहीं किसी ने कभी ऐसा है सुना ?वह औरत थी शायद कोई सफाई वाली प्रतिदिन वेटिंग रूम को साफ करने वाली उसे पच्चीस रूपये देने की सोच लगा मुझे कि ऐसे दान देते देते शीघ्र ही निकल जाएगा मेरा दिवाला मैंने कहा, देखता हूं। पर मेरे पास तो सौ का ही नोट कहां मिलेगा छुट्टा इसका। बीनू बोली- टिकट आफिस से मिल जाएगा छुट्टा। ठीक है देखता हूं क्या कर सकता हूं।

मैंने उस औरत को एक तरफ बुलाया, खूब डांटा फटकारा और धमकाया, ठगती हो यात्रियों को, अभी कर दूं शिकायत तो हाथ से जाएगी नौकरी तुम्हारी वह फुट फुट कर रोई, पैरो में गिरकर गिड़गिड़ाई, तो देकर उसे रूपये दो मैनें उससे छुट्टी पाई। मंदिर की ज्योति धुधला गई, अंततः वह बुझ गई। दो माह बाद मैं वापिस घर जा रहा था। एक बार फिर उतरा बिलासपुर स्टेशन पर इस बार एकदम अकेला। अपने अंतिम क्षणों में बीनू मेरी चरण रज लेते हुए बोली थी-कुछ भूल जाउॅ शायद सब कुछ, पर नहीं भूल पाउंगी ये अंतिम दो मास जो मेरे माथे पर हमेशा अंकित रहेंगे ऐसे, मां लक्ष्मी की मांग में लगा सिंदूर जैसे। इन दो महिनों ने, मेरी आत्मा को अमृत पिला दिया बस याद रहा इतना, लेते हुए तुमसे बिदा।हे अन्तर्यामी भगवान, काश।

मैें बीनू को बता पाता, मैं दोषी हूं तुम्हारा, उन दो महिनों की भेेंट से पच्चीस रूप्ये का़ ऋणी हूं तुम्हारा। बीनू को क्या पता कि उन दो महिनों में भी जो वह साथ ले गई, छला था मैने उसको। बिलासपुर स्टेशन पपरन उतर कर पूछा हरेक से रूकमणी का अता पता, नहीं मिला कोई उत्तर, कोई नहीं जानता था रूकमणी को, दिमाग पर जोर डालते हुए फिर पूछा-वही झमरू कुली की बीवी। पता चला अब नहीं रहते वे यहां, कहां, मिलेंगे नहीं था किसी को पता। स्टेशन मास्टर भी गुस्सा कर बोले-कौन जाने उनका पता? टिकट बाबू हंसकर बोले-चले गए एक माह पहले दार्जिलिंग, खसरूबाग या शायद अराकान। पूछा मैने-क्या कोई जानता है उसका पता? क्रोध से फटकारा मुझे-क्यों रखेगा कोई एक कुली का पता। कैसे मैं समझाता सबको? लगता था जो उनको तुच्छा सा पर मेरे लिए कितने महत्व का। केवल वही एक व्यक्ति दिला सकता था मुझे, मेरे विश्वासघात के भार से मुक्ति। इन दो महिनों ने मेरी आत्मा को अमृतमयी बना दिया-बीनू के इस अंतिम शब्दों की याद कैसे भुला पाउंगा ? मैं सदा उसका ऋणी रहूंगा अपने झूठ के अहसास से हमेशा ही घिरा रहूंगा।

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