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विशेष लेख : श्री ज्योति प्रसाद अगरवाला जयंती बड़ी महान हस्ती पर राष्ट्रीय स्तर पर गुमनाम, कब आयेंगे अच्छे दिन

श्री ज्योति प्रसाद अगरवाला का जन्म 17 जून 1903 को असम के तामुलबारी चाय बागान में हुआ था, वे अपने जमाने के महान असमिया क्रन्तिकारी, कवि, नाट्यकार, संगीतकार एवं फिल्मकार थे। इनके रिश्तेदार चंद्रकुमार अगरवाला, आनंद चंद्र अगरवाला भी महशूर असमिया कवि रहे है। अगरवाला जी  मारवाड़ी घराने में जन्मे पर असम एवं पूर्वोत्तर भारत में बहुत प्रख्यात रहे।

श्री ज्योति प्रसाद अगरवाला जी को असमिया संस्कृति के मजबूत स्तम्भकार कहा जाता है और इन्हे लोग रूपकुंवर नाम से भी बुलाते आ रहे है. इन्होने ने प्रथम असमिया फिल्म ज्योतिमती (1935) बना कर, असमिया सिनेमा की स्थापना की है. इनकी पुण्यतिथि 17 जनवरी को असम में शिल्पी दिवस के तौर पर मनाया जाता है.

भारत की आज़ादी में भी इनका भरपूर योगदान रहा है, वर्ष 1941 में इन्होने भी अपनी आवाज़ अंग्रेज़ो के खिलाफ भरपूर उठाई थी।

इन्होने 300+ से भी ज्यादा संगीत, 7 नाट्य, बहुत सारी लघुकथाएँ, साहित्य लिखे है।

भारत सरकार ने वर्ष 2004 में इनके नाम पर 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया है।

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असम में पहचान पर राष्ट्रीय स्तर पर गुमनाम 

जब भारत रत्न एवं पद्मा अवार्ड्स देने की बात आती है तो  फिल्म जगत एवं कला क्षेत्र में प्रांतीयता खूब देखी गयी है, छत्तीसगढ़, असम, दक्षिण भारत, नार्थ ईस्ट भारत एवं उत्तर भारत के राज्य जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश आदि को उतनी पहचान और अवार्ड नहीं मिल पाते जितने की महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से तालुक रखने हस्तियों को मिल रहे है। अथवा उन हस्तियों को मिल रहे है जो छोटे शहरों से निकल मुंबई अथवा दिल्ली में बस जाते है।

कला क्षेत्र में जब जब इनाम देने की बात आई है तो सिर्फ वंशवाद ही नहीं जातिवाद भी देखा गया है.

एक तो वैसे भी मारवाड़ी समाज को व्यापारिक सोच रखने वाला समाज बता कर पल्ला झाड़ा दिया जाता है, तो समाज से एक-दो महान कलाकारों को पहचान नहीं मिलेगी तो मारवाड़ी युवा वर्ग विभन्न क्षेत्रों में कैसे आगे आएगा।

असम के सारे युवा एवं नागरिक श्री ज्योति प्रसाद अगरवाला जी के नाम से राष्ट्रीय स्तर के सिने अवार्ड शुरू करने की इच्छा जाता चुके है एवं बार बार पत्राचार भी कर चुके है.

भारत सरकार एवं सम्बंधित मंत्रालय के मुताबिक क्या सिने व कला जगत केवल महानगरी मुंबई या कुछ बड़े नगरों तक ही सीमित है, जब दादा साहेब फाल्के जी के नाम अवार्ड शुरू हो सकता है तो अगरवाला जी के नाम पर कोई भी राष्ट्रीय अवार्ड क्यों नहीं हो सकता है। वे तो सिर्फ फिल्म ही नहीं साहित्य, कवि आदि भी रहे है।

मेरा आपसे एक और सवाल है श्री सचिन तेंदुलकर जो क्रिकेट खेलते है उन्हें भारत रत्न मिल चुका है, क्रिकेट ऐसा खेल है जो पूर्ण रूप से प्रोफेशनल है। इसकी इकाई BCCI सरकारी संस्थान नहीं है ना ही क्रिकेट कोई राष्ट्रीय खेल है।

विराट कोहली, रोहित शर्मा आदि खिलाड़ी उनके बनाये गए रिकॉर्ड आसानी से तोड़ लेंगे। पर क्या सचिन कोई साहित्य या रचना कर पाएंगे जो सांस्कृतिक पहचान बन पाये आने वाली सदियों तक याद रखा जाये।  उल्टा, हॉकी जो राष्ट्रीय खेल है जिसके मेजर ध्यानचंद जैसे महान खिलाडी रहे उन्हें कभी भारतरत्न नहीं दिया गया।

भारत रत्न, पद्म अवार्ड जैसे कई इनामो पर राजनितिक करन कल भी था और आज भी कायम है।

अच्छे दिन जो दिखाए गए थे  क्या वाकई में आ गए है जब  आप पूर्वतर भारत, असम, छत्तीसगढ़ और विभन्न समाज के कलाकारों को पहचान नहीं दिला पा रहे, तो सबका साथ कैसे होगा और विकास कैसे इसमें दो राय बन रही है।

सिर्फ 5 रूपया का डाक टिकट जारी कर देने से श्री अगरवाला जी का अपमान जैसा प्रतीत हो रहा है.

क्या श्री अगरवाला जी दिल्ली-मुंबई से दूर असम से आते है या फिर वे मारवाड़ी अग्रवाल समाज से आते है जो इन्हे वोट बैंक नहीं दिखता , क्या इसलिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं मिल रही, मेरी भारत की वर्तमान सरकार से निवेदन है कि अपने वादे को पूर्ण करे और श्री अगरवाला जी को पहचान दिलाये।

लेखक

श्री बिशेष दुदानी

पत्रकार, रायपुर

पत्रकार एवं लेखक के अपने निजी विचार है।

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