Monday, November 18

#culture हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार

धान का कटोरा के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ अपनी संस्कृति के साथ-साथ अनेकोनेक तीज त्योहारों के लिए भी जाना जाता है। और त्योहारों की शुरुआत होती है छत्तीसगढ़ के पहले तिहार ‘हरेली’ से। हरेली महोत्सव किसानों का महत्वपूर्ण त्योहार है। हरेली छत्तीसगढ़ी शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है ‘हरियाली’। तब प्रकृति भी प्रचंड गर्मी के बाद हरियाली से आच्छादित हो जाती है।

यह छत्तीसगढ़ के ‘गोंड‘ जनजातीय का मुख्य रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है यह त्यौहार हिंदू कैलेंडर के सावन (श्रावण) महीने के श्रावणी अमावस्या के दिन मनाया जाता है। जो जुलाई और अगस्त के बीच वर्षा ऋतु में होता है। यह त्यौहार ‘श्रावण’ के महीने के प्रारंभ को दर्शाता है जो कि हिंदुओं का पवित्र महीना है।

पशुधन और किसानी में काम आने वाले औजारों की पूजा की जाती है 

यह त्योहार पूरे दिन मनाया जाता है और किसी को भी कोई काम करने की अनुमति नहीं है। खेतों से संबंधित उपकरण और गायों की इस शुभ दिन पर किसान पूजा करते हैं ताकि पूरे वर्ष अच्छी फसल सुनिश्चित हो सके। घरों के प्रवेश द्वार नीम के पेड़ की शाखाओं से सजाए जाते हैं।

रिवाज

त्योहार के इस दिन ‘कुटकी दाई‘ फसलों की देवी की किसान पूजा करते है। फसलों की अच्छी पैदावार और पशुधन की स्वास्थ्य की कामना के साथ इस त्यौहार की धूम शुरू हो जाती है। इस दिन खेती सम्बंधित कोई काम नहीं किया जाता है।

इस त्योहार किसानो के बच्चों द्वारा ‘गेड़ी‘ नामक एक खेल खेला जाता है इस खेल में बच्चे बड़े बांस की छड़ियों में चढ़ कर खेतों के आसपास घूमते है। पारम्परिक ‘गेड़ी नृत्य’ का आयोजन किया जाता है। शाम को गांवो में मेला-मड़ई का लुफ्त उठाते है। साथ ही परम्परागत खेलो की प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है।

नीम का महत्त्व 

नीम में जबरदस्त रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है जिसे छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने पहले ही पहचान कर लिया था। वर्षा ऋतु में मौसम परिवर्तन की वजह से पानीजनित अनेक बीमारिया भी होती है। इसके बचाव के लिए नीम से दवाइया बनाई जाती है। और यही वजह है कि नीम की टहनी को इस दिन धरो के प्रवेश द्वार पर लगाया जाता है।

आदिवासी चिकित्सकों की यह समूह छत्तीसगढ़ राज्य के ‘बैगा जनजाति‘ से संबंधित है। यह जनजाति केवल हरेली त्योहार के दिन से पंद्रह दिनों के लिए अपने अनुयायियों को शिक्षित करता है। वे अपने छात्रों को ‘पंचमी’ के दिन तक पढ़ना जारी रखते हैं जो कि गणेश चतुर्थी के अगले दिन है। पंचमी के शुभ दिन वे अपने छात्रों के लिए परीक्षा का आयोजन करते हैं।

पारम्परिक भोज

अधिकांश पारंपरिक भोजन चावल से बनाया जाता है कांदा भाजी, कोचई पत्ता, चौलाई भाजी, लाल भाजी, बोहर भाजी और कोहड़ा जैसे विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियों से खाना तैयार करते हैं। मुठिया, फरा, अंगाकर रोटी, चोसीला रोटी कुछ व्यंजन है जो चावल के आटे से बनाये जाते हैं। बोरे बासी एक महत्वपूर्ण भोजन है। दुध फरा, बफौली, कुसली, खुरमी और बालूशाही गेहूं और चावल के आटे से मिठाई बनाई जाती हैं। महुआ नामक स्थानीय पेड़ के फल से बनाई जाने वाली पेय ​​आदिवासियों और किसानों द्वारा बहुत पसंद की जाती है।

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