Tuesday, September 21संस्थापक, प्रधान संपादक, स्वामी श्री नवनीत जगतरामका जी
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बीजापुर : सोलह साल बाद बच्चों ने देखी स्कूल की चौखट, हाथों में तिरंगा और किताब लिए शाला दाखिल, मना जश्न

बीजापुर। स्वाधीनता दिवस से पहले छत्तीसगढ़ के सबसे सुदूर और अति माओवाद प्रभावित बीजापुर जिले के तीन गांव के 300 से ज्यादा बच्चें को गांव में ही पढ़ने-लिखने की आजादी मिल गई। सोलह बरस बाद बीजापुर ब्लाक के पेद्दाजोजेर, चिन्नाजोजेर और कमकानार गांव में बच्चों को स्कूल नसीब हुई। इस दौरान तीनों ही गांव में जष्न सा माहौल था। एक हाथ में तिरंगा और दूसरे में स्लेट , किताब, कापी लिए बच्चे स्कूल पहुंचे। वाकई यह नजारा स्वाधीनता दिवस उत्सव जैसा ही था। 2004, 2005 में बस्तर में माओवादी के खिलाफ सलवा जुडूम के उदय के बाद नक्सलियों ने बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर के अंदरूनी इलाकों में स्कूल भवनों को निषाना बनाया था। अकेले बीजापुर जिले में तीन सौ से ज्यादा स्कूल तहस-नहस कर दिए गए थे। इनमें पेद्दाजोजेर, चिन्नाजोजेर, कमकानार गांव भी शामिल थे, जहां नक्सलियों ने स्कूलों को अपना निशाना बनाया। लगभग सोलह बरस बाद राज्य सरकार की मंशानुरूप बस्तर के अदंरूनी गांवों में बंद स्कूलों को दोबारा खोलन की पहल को अमली जामा पहनाने की जुगत में जिला प्रशासन के नेतृत्व में शिक्षा विभाग ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया।

दुर्गम इलाके उस पर नक्सली बंदिशो का समाधान निकालते हुए शिक्षा विभाग ने जैसे-तैसे गांव वालों का विश्वास हासिल कर लिया। अंततः ग्रामीणों के सहयोग से शेडनुमा स्कूल तैयार हुए। जिन्हें तैयार करने में वक्त भी लंबा लगा। पेद्दोजोजेर, चिन्नाजोजेर, कमकानार आदि गांव मिंगाचल नदी पार बसे हुए हैं। ऐसे में निर्माण सामग्री भी गांवों तक पहंुचाने में दिक्कतें पेश आई, बावजूद असंभव कार्य को शिक्षा विभाग के सतत् प्रयत्न ने पूरा कर दिखाया। माओवाद समस्या के बीच मिंगाचल नदी पार तीन गांवों में जहां ना अस्पताल है ना पंचायत भवन और ना ही कोई पक्की सड़क, स्कूल खोलने की जिद के आगे परिस्थितियां बौनी साबित हुई। कलेक्टर रितेश अग्रवाल के नेतृत्व में बीईओ मो. जाकिर खान और बीआरसी श्री दुब्बा ने पहले तो शिक्षकों का हौसला बढ़ाया। वे निरंतर शिक्षकों को साथ लेकर नदी पार कर गांवों में पहुंचते, ग्रामीणों को समझाईश देते। यह सिलसिला लम्बे समय तक चलता रहा । परिणामस्वरूप ग्रामीणों ने जागरूकता दिखाई और स्कूल निर्माण हाथ बंटाने आगे आए।

गांव में शिक्षा का मंदिर बनकर तैयार था। नए गणवेश में बच्चे उत्सूक थे स्कूल जाने को। स्कूल रंग-बिरंगे पताकों और गुब्बारों से सजे थे, लेकिन शाला प्रवेष से पहले गांव के गायता, पेरमा ने पूजा-पाठ की रस्म पूरी की। बीईओ समेत सभी शिक्षकों का तिलक किया फिर बच्चों को शाला प्रवेश कराया। उत्सव भरे माहौल में बच्चों के साथ बड़ी संख्या में अविभावक भी मौजूद थे। इतना ही नहीं शाला खुलने की खुशी में ग्रामीणों द्वारा सामुहिक भोज का प्रबंध भी किया गया था। सोलह बरस बाद लाल को स्कूल दाखिल कराने पहुंची माताओं की खुशी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब शिक्षकों द्वारा बच्चों को नए गणवेष दिए गए तो माताएं खुद अपने बच्चों के बाल संवारने से लेकर गणवेष पहनाने में जुट गई। बरसते पानी में छतरिया ताने माताएं अपनी संतानों को स्कूल यूनिफाॅर्म में देखने उत्सूक थी। गांवों में कल तक नक्सलियों की तूती बोलती थी, आज नजारा बदला हुआ था। हाथों में तिरंगा और जुबा पर स्कूल चले हम का नारा लगाते बच्चे किताब, स्लेट, काॅपी लेकर स्कूल दाखिल हुए। करीब डेढ़ दषक बाद नक्सलियों के पैठ वाले इस इलाके में स्वाधीनता दिवस सा यह नजारा वाकई लोगों को सुकून और मन में नई उम्मीदें, आशाओं को प्रदीप्त कर रही थी।

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