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बीजापुर : बस्तर में आज भी जीवित है बदुल परंपरा मजदूरों की जगह खेतों में हाथ बंटाते हैं साथी किसान

बीजापुर। साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना.. इस गीत से मेल खाती है बदुल पंरपरा, जो बस्तर के सीमावर्ती तेलंगाना की सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों की संस्कृति का एक भाग रही है। जिसके तहत खेतों में निराई-गुड़ाई का काम हो, फसल बुवाई हो या फिर कटाई। इनके लिए बदुल का आयोजन कर ग्रामीणों का सामूहिक सहयोग लिया जाता रहा है। इस परंपरा का आयोजन दषकों से किया जा रहा है। हालांकि आधुनिकता के दौर में अब जब खेती मजदूरों और कृषि उपकरणों के भरोसे हो रही हैं, यह परंपरा विलुप्ति की ओर है, इसके बाद भी यह परंपरा कुछ इलाकों में जीवित है।

बीजापुर जिला मुख्यालय से लगभग 55 किमी दूर ग्राम पंचायत उसूर के सोढ़ी पारा के किसान दषकों से चली आ रही परंपरा का पालन आज भी कर रहे हैं। बदुल के तहत गांव का कृषक दूसरे किसानों के घर-घर जाकर उनको अपने खेत में फसल की बुवाई से लेकर कटाई के लिए न्यौता देता और गांव के लोग सामूहिक रूप से न्यौता स्वीकार कर किसान के खेत में बुवाई, रोपाई, कटाई में जुट जाते । किसानों के इस सामूहिक सहयोग में गांव का हर एक कृषक परिवार एक साथ काम करते हैं, लेकिन हाथ बंटाने आने वाले साथी किसानों को काम के बदले मजदूरी नहीं दी जाती थी बल्कि कार्य संपन्न होने पर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।

सोढ़ी पारा के रहने वाले षिक्षक गणेष सोढ़ी बताते हैं कि बदुल का आयोजन गांव में दशकों से होता आ रहा है। जितने भी कृषक परिवार है साथी कृषक के खेतों में हाथ बंटाते हैं। अभी बुवाई, रोपाई का काम चल रहा हैै। गांव कृषक परिवार से प्रतिदिन साथी किसान के खेतों में जुट रहे हैं और काम में हाथ बंटा रहे हैं। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक गांव के सभी किसानों के खेतों में फसल की बुवाई, रोपाई नहीं हो जाती। इसके बाद बारी जब फसल कटाई की आती है फिर एक बार बदुल का आयोजन कर आपसी सहयोग से कार्य किया जाता हैं।  ऐसा करने से खेती कार्य के लिए उन्हें मजदूरों की आवश्यकता नहीं पड़ती। और ना ही मषीन भाड़े पर मंगवाने की जरूरता। बदुल का आयोजन भी इसी उदेश्य की पूर्ति के लिए है। षिक्षक के मुताबिक बदुल दोरली जनजाति में प्रचलित शब्द है। जिसका तात्पर्य आपसी सहयोग से है। गौरतलब है कि देश के कई भागों में यह परंपरा प्रचलित है, जिसे लाह भी कहा जाता है।

विशेषः पी.रंजन दास

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