देव उठनी एकादशी के पावन पर्व पर खाटू वाले श्री श्याम प्रभु के जन्मदिन पर विशेष आलेख

श्री श्याम खाटू कथा
रायगढ़ । कुरूक्षेत्र के मैदान में महाभारत – युद्घ की तैयारियॉ हो रही थी । कौरव और पाण्डव दोनों पक्षों की सेनायें युद्घ भूमि में आमने सामने कुछ दूरी के फासले कपर आकर डट चुकी थी । युद्घ में भाग लेने के इच्छुक अनेक देशों के अधिपति अपनी- अपनी सेनाओं सहित मैदान के मध्य आकार अपना परिचय देते और वे युद्घ में किस पक्ष का साथ देने आये है, यह बतलाते थे । फिर उनके समर्थित पक्ष के नायक लोग आकर उन्हें आदर सहित अपने पक्ष में सम्मिलित कर लेते थे । इसी सिलसिले के बीच दोनों पक्षों ने देखा कि एक विशाल तेज-पुंज रथ तेजी से उनकी तरफ बढ़ा आ रहा है और उस पर एक बर्बराकर घने केश वाला एक परम तेजस्वी नव युवक विराजमान है । उस तेजस्वी के साथ कोइ्र सेना नहीं है अपितु शस्त्रों के नाम एक घनुष तथा तरकस में सिर्फ तीन तीर है । उस अदभूत वीर के युद्घ भूमि के मध्य आने पर भगवान श्री कृष्ण ने आगे बढकर उसका अभिनन्दन किया और उससे अपना परिचय तथा युद्घ क्षेत्र में आने का कारण पूछा । वीर ने उत्तर दिया – मेरा नाम बर्बरीक है । मै पाण्डव नन्दन महाबली भीम के पुत्र घटोत्कछ का लड़का हॅू, मेरा यह प्रण है कि मै युद्घ में कमजोर पक्ष का साथ दोता हॅू और उसकी पराजय को जय में बदल देता हॅू । दुस्साहसी बीर की बात सुनकर दोनों पक्ष आश्चर्य चकित हो गये । श्री कृष्ण मुस्कराकर पूछा हे बीर ! तुम्हारे तरकस में सिर्फ तीन तीर दिखाई दे रहे है और तुम बात कर रहे हो युद्घ का पासा पलट देने की , क्या तुम्हारा मिथ्या अभिमान नहीं है? युवाक ने शीश झुकाकर नम्रता पूर्वक कहा -प्रभु ! यह अभिमान नहीं है, वास्तविकता है । मेरे पास ये जो तीन तीर है ये मैने महि-सागर संगम तीर्थ में नारदजी की आज्ञानुसार नव दुर्गाओं की आराधना कर उनसे प्राप्त किये है इसमें यह शक्ति है कि जिसका स्मरण कर मै ये बाण छोड़ता हॅू मेरा पहला बाण उसके मर्म स्थल को चिन्हित कर देता है और दूसरा बाण उस चिन्हित स्थन को भेद डालता है । अपना काम पूरा कर ये बाण मेरे पास वापस आ जाते है । दूसरा वरदान मैने कुछ समय बाद उसी स्थान पर आकर सिद्घमाता की निर्विघ्नं साधना तपस्या करने वाले मगघ देश के महर्षि गुरूदेव विजय सेन (सिद्घसेन) से प्राप्त किया था । महर्षि ने वहां आकर जब सिद्घमाता की निर्विध्न तपस्या की उस समय मेने दिन-रात राक्षसों एवं जगली जानवरों से उनकी रक्षा की थी और उसी से खुशी होकर महर्षि ने मुझे युद्घ में हमेशा विजयी होने का वरदान दिया था । अत: मै इन तीनों बाणों से महाभारत तो क्या तीनों लोक को जीतने की क्षमता रखता हॅू । यह सुन श्री कृष्ण ने उस वीर के पास ही एक वृक्ष के सब पत्ते छेद कर अपना दावा पुष्ट करने को कहा और बड़ी चतुराई से एक पत्ता अपनी मुट्ठी में और दूसरा पैर के नीचे छिपा लिया ।
श्री कृष्ण का आदेश् पाकर वीर ने एक के बाद दूसरा तीन पेड़ की तरफ छोड़ दिया और पल भर में ये दोनों तीर उस पेड़ के सब पत्तों को छिद्रित कर वापस उनके तरकस में आ गये । श्री कृष्ण ने यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि पेड़ के सब पत्तों के साथ् ही साथ उनके द्वारा छिपाये गये दोनों पत्ते भी बाण से छिद्रित हो गये । अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि यह वीर वास्तव में युद्घ का पासा पलट सकता है । श्री कृष्ण जो मन से पाण्डवों को जिताने के लिए कृत संकल्प थे, उस वीर को पाण्डव पक्ष का साथ देने को राजी करने हेतु समझाने लगे । उन्होंने कहा कि हे वीर तुम स्वयं एक पाण्डव कुल के दीपक हो, अत: तुम्हें तो अपने कुल का ही साथ देना चाहिये । इस पर बर्बरीक ने कहा कि हे यदुनाथ आप तो स्वयं अन्तर्यामी है, सब घट- घट की बात को जानते हैं, आप स्वयं जानते होंगे कि मै बचपन से दो प्रण कर रख्े हे – पहला यह है कि मै हमेशा कमजोर का साथ दूंगा तथ दूसरा मुझसे दान में कोई कुछ भी मांगेगा वह कैसे भी करके उसको दूंगा । अत: मुझे किसी पक्ष विशेष का साथ देने को मजबूर न करो मुझे युद्घ देखने दें । अंत में मै जिसकी हार होगी देखूंगा बस उसी का साथ दूंंगा और उसकी पराजय को जय में बदल दूंगा । यह सुनकर श्री कृष्ण के दिमाग में तुरंत एक योजना आई और बोले – हे वीर! तुम्हारी बहादुरी का सबूत तो तुमने दे दिया लेकिन तुम्हारे दानी होने की बात का सबूत और चाहिये, तुम्हारे इस सबूत के रूप में इस महायुद्घ के शुरू करने के पूर्व युद्घ – भूमि को किसी शूर वीर की बलि हेतु हम तुम्हारा शीश दान में मांगते है । श्री कृष्ण की कूटनीति चाल बर्बरीक तुरंत समझ गये । लेकिन उसके बावजूद अपने प्रण पर अटल महादानी अपना शीश दान करने को सहर्ष तैयार हो गया ओर कहा कि ये अन्तर्यामी मेरी एक प्रबल इच्छा को तो आप जानते ही हो कि मै इस महायुद्घ के जिसमें कि एक से एक पराक्रमी अपने पराक्रम से युद्घ जीतने की कोशिश करेंगे उनके पराक्रमों को अपनी आँखों से देखना चाहाकता हॅू । श्री कृष्ण ने कहा कि हे वत्स ! मै तुम जैसे पराक्रमी से ऐसी ही इच्छा की आशा करता था । मै तुमसे खुश होकर वरदान देता हॅू कि यह तुम्हारा शीश तुम्हारे शरीर से अलग होकर भी अमर रहेगा । तुम अपनी आंखों से पूरा युद्घ देखोगे । श्री कृष्ण का आशीर्वाद मिलते ही वीर ने स्वयं अपने हाथों से अपना शीश धड़ से अलग कर प्रभु-चरणों में चढ़ा दिया । एक अद्वितीय नवयुवक योद्घा द्वारा इस प्रकार का दान देकर देवी देवताओं ने आसमान से पुष्प वर्षा की । श्री कृष्ण ने उस शीश को दिव्य अमृत रूपी जड़ी – बुटियों का लेप कर युद्घ क्षेत्र के पास के सबसे उंचे टीले पर विराजमान कर दिया और इस प्राकार एक महान व्यक्तित्व के नि:स्वार्थ बलिदान के साथ ही रण दुंदुभिका बज उठी और प्रारंभ हो गया एक विश्वयुद्घ जिसे ‘‘ महाभारत’’ की संज्ञा दी गई । इसके बाद अठारह दिन महाभारत का घमासान युद्घ चुलता रहा और अन्त में पाण्डव कुल विजयी हुआ । अपनी इस अप्रत्याशित विजय पर पाण्डव पक्ष का हर सद स्य स्वयं अपने आपको विजयश्री दिलाने वाला कहने लगा । उनका घमंड दूर करने के लिये श्री कृष्ण उन सबको लेकर उस शीश के पास गये जिसने शुरू से अन्त तक पूरा युद्घ देखा था और उससे जाकर युद्घ की समीक्षा करने को कहा । वीर बर्बरीक के शीश ने निर्भिक होकर हंसते हुए उत्तर दिया कि इस महायुद्घ का असली विजेता स्वयं श्री कृष्ण ही है । उन्होंने अपनी बुद्घि एवं नीति के जरिये इस महायुद्घ को पाण्डवों के पक्ष में जिताया है । मुझे तो इस युद्घ में चारो तरफ श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र एवं महाशक्ति दुर्गा के रूप में द्रोपदी का खड्ग ही चलते हुए नजर आ रहा था । ये दोनों धड़ाधड़ नरसंहार में लगे हुये थे । अर्जुन के रथ पर फहरा रही पताका पर वीर हनुमान स्वयं साक्षात विराजमान थे, जिन्होंने रथ पर होने वाले किसी भी आघात को स्वयं सह कर रथ को स्थिर रखा, अन्यथा वह कभी का पाताल पहुंच जाता । बर्बरीक के शीश के द्वारा यह सुनकर पाण्डव लोग शर्म से श्री कृष्ण के समक्ष नतमस्तक हो माफी मांगने लगे । श्री कृष्ण ने बर्बरीक के अदभूत दान एवं स्पष्ट वादिता को देखकर उन्हें अपने चतुर्भुज रूप दर्शाया और वरदान दिया कि हे वत्स! मै तुम पर खुश होकर तुम्हे अपने आप में विलीन कर रहा हॅू और अपना प्यारा नाम ‘‘श्याम’’ तुम्हें समर्पित करता हॅूु । मेरा वरदान है कि तुम्हारा यह शीश कलयुग में साक्षात प्रकट होगा और तुम मेरे ‘‘श्याम’’ नाम से घर – घर पूजे जाओगे । तुम्हें मेरी शक्ति मिलेगी और तुम सोलह कलाओं के अवतारी माने जाते हुए अपने भक्तों की सच्चे मन से मुरादें पूरा करोगे । तुम्हारे भक्त तुम्हारे ध्यान मात्र से संकटों से छुटकारा पायेंगे । सज्जनों ! वही वीर बर्बरीक का शीश कालांतर तक भगवत पुराण के अनुसार ‘खटांग’ व आज के ‘खाटू धाम’ (राजस्थान के सीकर जिले का एक गांव) की भूमि में समाया रहा और भगवान श्री कृष्ण के वरदान – स्वरूप जब उसके प्रकट होने का समय आया तब इसमें चेतना जाग्रत हुई और उसने अपने स्थान के आस पास घास चरने वाली कामधेनु के समान एक सुन्दर सुडोल गाय का दूध अपनी देव कला से खींच कर पीना शुरू कर दिया । गाय का मालिक एक ब्राम्हण था । वह यह देखकर कि उसकी गाया जो हमेशा काफी दूध देती थी, बिल्कुल दूध नहीं दे रही है, वह काफी परेशान हुआ । उसने सोचा कि जब चरने जाती है तब शायद कोई उसका दूध निकाल लेता होागा । अपनी शंका समाधान हेतु एक दिन ब्राम्हण ने गाय जब चरने जंगल में गई तब उसका पीछा किया । गाय यत्रवत हमेशा की तरह ठीक उसी स्थान पर जाकर रूकी और उसके थनों से दूध की धाराएं अपने आप निकल कर धरती के गर्भ में समाने लगी । गाय के मालिक को यह दृश्य देखकर काफी आश्चर्य हुआ और उसने सारी बातें अपने साथियों को बताई दूसरे दिन वे सभी गाय के पीछे गये और ब्राम्हण की कहीं बात अपनी आॅखों से देखा और जमीन में छिपे रहस्य को जानने के लिये उस स्थान की खुदाई करनी शुरू की । थोड़ी ही खुदाई करने पर जमीन से आवाज आई कि जमीन धीरे- धीरे खोदना यहॉ ‘‘श्याम’’ छिपे है । कुछ और खोदने पर लोागों का आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्हें उस स्थान पर एक दाढ़ी – मूंछो से घिरा एक अद्वितीय नर-मुण्ड मिला । पातालवाणी के हिसाब से यह नर-मुण्ड ही ‘‘श्याम’’ थे । दाढ़ी- मूंछों से घिरा होने के कारण उनको ‘‘श्याम बाबा’’ कहा जाने लगा । गांव वालों ने यह मूर्ति उसी ब्राम्हण को दे दी, जिसे ब्राम्हण अपने घर ले गया और रोज सुबह- शाम उसकी पूजा करने लगा । कुछ समय बाद गांव के राजा को स्वप्न में श्याम बाबा ने दर्शन दिये और उस गांव में उनका एक मंदिर बनवाकर उनकी उस मूर्ति को वहां स्थपित करने का आदेश दिया । आज्ञानुसार राजा ने गांव में मंदिर बनवाया और उस मूर्ति को उसमें विधिवत स्थापना करवा दी । वहीं ‘‘श्याम- मंदिर’’ श्याम-धाम’’ बन गया । फाल्गुन शुक्ल एकादशी को श्याम जी प्रकट हुये थे । अत: इस प्रकार महोत्सव दिवस पर हर साल वहां देश -विदेश से लाखों की संख्या में इनके भक्त पहुंच कर बड़े धुम-धाम से इनका पूजन करते है और अपनी मुरादों की झोली भर कर लाते है । वह स्थान जिसे खोदकर ‘‘श्याम जी’’ की मूूर्ति निकाली गई थी, एक कुंड के रूप में बन गया और उसमें बारहों महीने अटूट अथाह शीतल मीठे जल का श्रोत बहने लगा उसे ‘‘श्याम कुंड’’ कहा जाने लगा । दूर- दूर से आये भक्तगण उसमें स्रान कर अपने पापों को छुटकारा पाते है और गंगाजल के भांति इसके जल को शीशियों में भर कर अपने घरो में ले जाते है और हवन पूजन अथवा किसी बिमारी में प्रसाद के रूप में इसका उपयोग करते है । फाल्गुन शुक्ल एकादशी के साथ ही साथ हरेक एकादशी पर भी खाटू धाम में असंख्य भक्त पहुंचते है । कार्तिक शुक्ल देव उठनी एकादशी श्याम प्रभु के जन्म दिन के रूप में बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है और बारह महिनों में यही वह शुभ दिन है जिस दिन खाटू मंदिर के पट दिन रात दर्शन के लिए खुले रहते हैं ।