जनसेवा की मिसाल हैं अग्र विभूतियां

रायगढ़ की राजनीति वर्ष 1963 तक आधुनिक रायगढ़ के निर्माताओं स्व. सेठ किरोड़ीमल एवं स्व. सेठ पालूराम धनानिया के इर्द गिर्द ही घूमती थी। सही मायनों में रायगढ़ की राजनीति और प्रषासन दोनों पर स्व. पालूराम धनानिया का ही वर्चस्व रहता था। स्व. रविषंकर शुक्ल (तात्कालीन मुख्यमंत्री अविभाजित म.प्र.) तथा स्व. द्वारिका प्रसाद मिश्र से पालूराम धनानिया जी के आत्मीय संबंध थे। नेपथ्य में स्व. किरोड़ीमल जी रहते थे। दोनों के अथक प्रयासों ने रायगढ़ के विकास को नया आयाम दिया और जनमानस इन्हें आधुनिक रायगढ़ का निर्माता मानने लगे। पालिटेक्नीक कॉलेज के शिलान्यास के लिए तात्कालीन राष्टÑपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद रायगढ़ पधारे थे और उन्होने रायगढ़ जिले में दस प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की आधारशिला रखी थी। पं. रविशंकर शुक्ल जब भी रायगढ़ आते थे हमेशा सेवा कुंज में ही ठहरते थे। सेठ किरोड़ीमल चेरिटी ट्रस्ट के माध्यम से जनसेवा के रूप में अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, धर्मशाला, मंदिर का निर्माण इन महान विभूतियों की निशानी के रूप में आज भी है। उस समय जनता की मांग पर स्टेडियम का निर्माण भी तय हो गया था किन्तु किन्ही राजनैतिक कारणों से संभव नही हो पाया जो कि लगभग 25 वर्ष बाद मूर्तरूप ले सका। प्रशासन पर स्व. पालूराम धनानिया की पकड़ इतनी मजबूत थी कि जिले में कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक इनकी मर्जी से ही पदस्थ होते थे। छोटे-मोटे अधिकारियों की पदस्थापना तो इनके दो चहेते मुलाजिम स्व. निरंजनलाल शर्मा और बोधराम यादव ही करते थे। रायगढ़ के एक कलेक्टर का चंद घंटों के भीतर तबादले का किस्सा आज भी पुराने लोग याद करते हैं। a
बैजनाथ मोदी
1952 में हुए प्रथम आम चुनाव में स्व. बैजनाथ मोदी गद्दी के आदमी के रूप में कांग्रेस के प्रत्याशी बनाये गये और उन्होने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रामकुमार अग्रवाल को हराकर विधायकी का ताज पहना। इनके कार्यकाल में सेठ किरोड़ीमल धर्मादा ट्रस्ट के माध्यम से जनसेवा के रूप में कई महत्वपूर्ण भवनों के निर्माण की आधारशिला रखी गई। मेन हास्पिटल, भव्य नटवर हाई स्कूल, पालीटेक्नीक कॉलेज तथा बालमंदिर आरंभ हुए।
रामकुमार जी अग्रवाल
रायगढ़ विधानसभा के कांग्रेसी किले को समाजवादी तोप से उड़ाने का काम वर्ष 1957 के आम चुनावों मे रामकुमार अग्रवाल ने किया। इनके बारे में यह लिखना आवश्यक है कि ये जिससे भी चुनाव हारे उसे हराया जरूर। केवल कृष्ण कुमार गुप्ता ही अपवाद रहे जिन्हें हराने का मौका स्व. रामकुमार अग्रवाल जी को नही मिला लेकिन 2003 के चुनावों में भाजपा प्रत्याशी विजय अग्रवाल का समर्थन कर इन्होने कृष्ण कुमार गुप्ता को हराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। 1957 के बाद वर्ष 1962 के आम चुनावों में इन्हें हार का सामना करना पड़ा और गद्दी के कर्मचारी निरंजनलाल शर्मा विधायक चुने गये। लेकिन 1967 के चुनावों में निरंजनलाल शर्मा को हराकर इन्होने अपनी हार का बदला ले लिया। उसके बाद 1972 एवं 1977 के चुनावों में श्री अग्रवाल ने कां्रगेस प्रत्याशी के रूप में जीत का स्वाद चखा। श्री अग्रवाल लम्बे समय तक जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष भी रहे। अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों स्व. द्वारिका प्रसाद मिश्र तथा स्व. प्रकाशचन्द्र सेठी एवं मोतीलाल वोरा से स्व. श्री रामकुमार जी के घनिष्ठ संबंध रहे। इन्होने अपने कार्यकाल में अनेक स्कूलों, टीपाखोल बांध, कोकड़ी तराई बांध का निर्माण कराया वहीं सहकारी बैंक के माध्यम से अनेकों युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। केलो बांध के लिए इनका संघर्ष किसी से छिपा नही है किन्तु केलो के लिए विधायकी से हटने के बाद इन्होने बहुत ज्यादा संघर्ष किया। मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल में दो-दो बार लगभग शामिल कर लिये जाने की संभावनाओं को सारंगढ़ महल और गद्दी के विरोध ने मूर्तरूप नही लेने दिया।
इनके कार्यकाल में 1977 की भाजपा सरकार में केलो बांध के सर्वेक्षण संभाग को रायगढ़ से हटाकर बिलासपुर स्थानांतरित कर देना भी महत्वपूर्ण घटना रही। इन्होेंने अपने राजनैतिक जीवन में कभी भी समझौतावादी रूख नही अपनाया जिसके कारण आनेकों बार भारी राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ा। अपनी स्पष्टवादिता और सदैव उपलब्धता के कारण इन्होने जनता के साथ-साथ समाज में भी अपना वर्चस्व कायम रखा । श्री अग्रवाल नगर की लगभग सभी समाजसेवी संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। लोग आज भी इन्हें जननायक के रूप में याद करते हैं।
लखीराम जी अग्रवाल
तात्कालीन जनसंघ को तमाम विपरीत परिस्थितियों में जीवित रखना लखीराम अग्रवाल जैसे धाकड़ व्यक्तित्व के ही बस की बात थी। हालांकि वे चुनाव मैदान में कभी परचम नही लहरा सके लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अविभाजित मध्य प्रदेश का अध्यक्ष उस समय बनाया जब वे मात्र तीन हजार मतों से नंदकुमार पटेल के हाथों पराजित हो गये थे। उसके बाद उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। छश्रीसगढ़ राज्य निर्माण में उनकी महती भूमिका से इंकार नही किया जा सकता। राज्य निर्माण के पश्चात् छश्रीसगढ़ में विपरीत माहौल को संभाले रखने में उनके योगदान को भुलाया नही जा सकता। आपातकाल में वे लगभग 18 महीने जेल में भी रहे। रमनसिंग को मुख्यमंत्री बनाने में भी उनकी भूमिका से इंकार नही किया जा सकता। सरकार ने उनके मरणोंपरांत उनका सम्मान करते हुए रायगढ़ के मेडिकल कॉलेज का नामकरण भी उनके नाम पर किया है। लखीराम जी प्रादेशिक स्तर से लेकर जिला स्तर के अनेक समाजसेवी संगठनों से जुड़े रहे।
कृष्ण कुमार गुप्ता
सक्रिय राजनीति से दस कदम पीछे रहने के बावजूद ,तात्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरागांधी की इस घोषणा के पश्चात् कि 1977 में संकट के समय मध्यप्रदेश के सभी जीतने वाले विधायकों को टिकट दिया जायेगा और उस समय मध्यप्रदेश से कांग्रेस के 83 विधायक जीते थे उनमें से 82 को टिकट मिली केवल एक विधायक रामकुमार अग्रवाल की टिकट कटी वो भी कृष्ण कुमार गुप्ता के लिए। रायपुर के कलेक्टर रहे और बाद में इंदिरा गांधी के सचिव बने स्व. व्ही.एस. त्रिपाठी के कारण 1980 में पहली बार 36 वर्ष के युवा पालूराम धनानिया के पौत्र कृृष्ण कुमार गुप्ता को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया। रामकुमार जी निर्दलीय होकर लड़े और कृष्ण कुमार गुप्ता ने लगभग 20 हजार मतों से चुनाव जीता। चुनाव जीतते ही श्री गुप्ता ने रायगढ़ विधानसभा को राष्टÑीय ग्रामीण विद्युतीकरण योजना में शामिल कराकर 95 गांवों में बिजली की रोशनी फैला दी। 1983 में अर्जुन सिंग ने इन्हें मध्यप्रदेश भूमि विकास निगम का अध्यक्ष भी बनाया। 1985 , 1990, 1993 में भी श्री गुप्ता ने जीत का परचम लहराया। मध्य प्रदेश में फंड की भारी कमी के बावजूद जामगांव तक बारहमासी आवागमन हेतु पुलों का निर्माण, चक्रपथ, सर्किट हाउस के पास रपटा तथा कयाघाट के पास रपटा का निर्माण करवाकर शहर के यातायात को सुगम बना दिया। स्टेडियम तथा स्वीमिंग पुल का निर्माण भी श्री गुप्ता के स्वर्णिम अध्याय का पन्ना है। 1998 में लगातार पांचवी बार जीतने के पश्चात् दिग्विजय सिंह ने पहली बार रायगढ़ की जनता का सम्मान करते हुए कृष्ण कुमार गुप्ता को केबिनेट मंत्री बनाया और खनिज तथा जनशक्ति नियोजन विभाग सोंपे। तकनीकी शिक्षा मंत्री बनते ही श्री गुप्ता ने रायगढ़ को इंजीनियरिंग कॉलेज की सौगात दी तो खनिज विभाग से रायगढ़ शहर की सड़कों के लिए एक करोड़ की राशि उपलब्ध कराई। छश्रीसगढ़ राज्य निर्माण होने के पश्चात् प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कृष्ण कुमार गुप्ता को स्वास्थ्य तथा सामान्य प्रशासन विभाग सौपे। श्री गुप्ता ने स्वास्थ्य मंत्री बनते ही सबसे पहले रायगढ़ को मेडिकल कॉलेज तथा राजधानी रायपुर के सरकारी अस्पताल के पहले रायगढ़ जिला चिकित्सालय को सी.टी.स्केन मशीन उपलब्ध कराई। अढ़ाई वर्ष के कार्यकाल में रायगढ़ के अनेक जरूरतमंदों का नि:शुल्क बाईपास का आॅपरेशन करवाया। श्री गुप्ता के कार्यकाल में महिला कॉलेज, रायगढ़ शहर में तीन नये हाई स्कूल, ग्रामीण क्षेत्र में अनेको हाई स्कूल खोले गये। 2003 का चुनाव हारने के बाद श्री गुप्ता ने धीरे-धीरे स्वयं को सक्रिय राजनीति से दूर कर लिया है। वे अभी भी नगर की लगभग सभी सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।
विजय अग्रवाल
आजादी के बाद जनसंघ और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी को पहली बार रायगढ़ विधानसभा में विजय जूलूस निकालने का अवसर युवा विजय अग्रवाल ने दिया जब उन्होन कांग्रेस के अजेय योद्धा कृष्ण कुमार गुप्ता को परास्त किया। हालांकि विजय अग्रवाल 1993 का चुनाव कृष्ण कुमार गुप्ता से हार चुके थे। भाग्य में लिखे को कोई नही मिटा सकता इस कहावत को चरितार्थ किया था विजय ने 2003 के चुनावों में टिकट मिलने से कुछ माह पूर्व तक वे भाजपा से निलंबित थे। रणविजय सिंह द्वारा टिकट मिलने के दो दिनों बाद मैदान छोड़ देने से घबराई पार्टी ने आनन-फानन में विजय अग्रवाल को टिकटा थमा दिया और उन्होने इतिहास रच दिया। विजय के कार्यकाल में केलो नदी के चार नये पुलों की सौगात मिली वहीं चक्रधर नगर क्षेत्र की सड़कों का कायाकल्प भी इन्हीं के कार्यकाल में हुआ। महानदी पर राज्य के सबसे लम्बे पुल की कार्ययोजना स्वीकृत कराना टांसपोर्ट नगर मिनी स्टेडियम और केलो नहर निर्माण का काम आरंभ कराना विजय की महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। हालांकि ओव्हार ब्रिज निर्माण ही सुस्त गति तथा तात्कालीन कलेक्टर एस.के. राजू के तबादले के कारण रोके गये निर्माण कार्यों का खामियाजा विजय अग्रवाल को भुगतना पड़ा और 2008 का चुनाव वे डॉ. शक्राजीत नायक से हार गये। विजय की मिलनसारिता के कारण आज भी उनके प्रशसकों की कमी नही है। सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण आज भी उनके पास समस्या लेकर आते हैं जिनका यथा संभव निराकरण का प्रयास भी वे करते हैं।
रोशनलाल अग्रवाल
इन्हें संघर्ष का दूसरा नाम कहें तो कई अतिशयोक्ति नही होगी। वर्ष 1998 में भाजपा ने इन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था और इन्होने अपनी जीत की इबारत उसी लिख दी थी किन्तु पार्टी के असंतुष्टों की वजह से ये मात्र 1800 मतों से चुनाव हार गये। पार्टी ने इन्हें 2003 में भी टिकट का प्रस्ताव दिया लेकिन इनके द्वारा इंकार दिये जाने से विधायकी इनके लिए पांच वर्ष आगे सरक गयी। वर्ष 2013 के आम चुनावों में रोशनलाल ने कांग्रेस प्रत्याशी को 20 हजार से भी ज्यादा मतों से परास्त कर नया रिकार्ड कायम कर दिया। हालांकि इन्हे अभी विधायक बने मात्र ढाई वर्ष ही हुए है लेकिन क्षेत्र की जनता से संपर्क और ग्रामीण क्षेत्र तथा शहर की सड़कों के लिए इन्होने शासन से करोड़ों की स्वीकृति कराकर अपनी सक्रियता का परिचय दे दिया है। 2003 में विजय अग्रवाल को जिताने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
गिरधर गुप्ता
गजब की सांगठनिक क्षमता के धनी गिरधर गुप्ता की क्षमता को सबसे पहले लखीराम जी ने प्रादेशिक स्तर पर पहचान दिलाई जब 1993 की पटवा सरकार में उन्हें मध्य प्रदेश खनिज विकास निगम जैसे भारी भरकम उपक्रम का अध्यक्ष बनाया। लखीराम जी के अत्यंत करीबी रहे श्री गुप्ता ने भी नंदकुमार पटेल के विरूद्ध भाग्य आजमाया था किन्तु भारी मतों से परास्त हो गये। पराजय से निराश होने की बजाय श्री गुप्ता लगातार संगठन को मजबूत करने में लगे रहे। वर्ष 2003 में रमनसिंग द्वारा सत्ता संभालने के पश्चात् श्री गुप्ता को पुन: राज्य के एक निगम का दायित्व सोंपा गया। वे प्रदेश भाजपा के महामंत्री भी रहे। कुछ दिनों पूर्व ही श्री गुप्ता प्रदेश महामंत्री के रूप में भाजपा की राष्टÑीय कार्य समिति की केरल में हुई बैठक में शामिल होकर लौटे हैं। रायगढ़ जिले की भाजपाई राजनीति में आज भी उनकी तूती बोलती है।
डॉ. मातूराम अग्रवाल
रायगढ़ नगर पालिका की राजनीति डॉ. मातूराम अग्रवाल के बिना अधूरी थी। आरंभ से ही कांग्रेस के साथ जुड़े रहे श्री अग्रवाल ने अनेक लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में नगरीय क्षेत्र में कांग्रेस के चुनाव संचालक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इस कदर निभाई कि संकट के समय भी रायगढ़ नगर से कभी कांग्रेस परास्त नही हुई। एक बार कांग्रेस की टिकट पर नगर पालिका अध्यक्ष बने मातूराम जी का कार्यकाल विकास की दृष्टि से अविस्मरणीय रहा। आरक्षण की व्यवस्था लागू होने के बाद भी मातूराम जी के सहयोग के बिना कुर्सी तक पहुंच पाना असंभव था। पार्षदों से उनका इतना अत्यधिक लगाव होता था कि कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय तथा विपक्षी पार्षद भी मातूराम जी के पारिवारिक सदस्य माने जाते थे। 1999 में हुए नगर पालिका चुनावों में कांग्रेस की टिकट से वंचित होने के बाद उन्होने निर्दलीय चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। शहर की जनता ने उनके पिछले कार्यकाल को याद करते हुए हाथों हाथ लिया ओैर कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे स्थान पर चला गया। शहर की साफ सफाई, पेयजल व्यवस्था के प्रति उनकी इतनी अधिक सक्रियता रहती थी कि वे अल सुबह दुपहिया चलाते हुए शहर का अकेले भ्रमण कर स्वयं कमियों को ढूंढते थे। नगर की अनेक सामाजिक संस्थाओं को अध्यक्ष पद से सुशोभित किया। समाज के हर कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भूमिका रहती थी। चाहे छोटा हो या बड़ा डॉ. मातूराम हर व्यक्ति के सुख-दुख में हमेशा अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे।
महावीर बेरीवाल
ठाकुर बन्धुओं की किचन केबिनेट के प्रमुख सदस्य महाबीर बेरीवाल मृत्युपर्यन्त तक कांग्रेस से जुड़े रहे। हालांकि श्री बेरीवाल ने कभी कोई सीधा चुनाव नही लड़ा लेकिन अर्जुन सिंग ने इन्हें रायगढ़ नगर पालिका की प्रशासनिक समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया था। श्री बेरीवाल ने तमाम राजनैतिक विरोध के बावजूद अत्यंत दृढ़ता से संजय काम्पलेक्स और कमला नेहरू पार्क का निर्माण कराया जो आज शहर की प्रमुख धरोहर बन गये हैं। श्री बेरीवाल लम्बे समय तक पत्रकारिता से भी जुड़े रहे।
अग्र समाज की महान विभूतियों स्व. श्री मुन्नालाल बोंदिया, स्व. श्री डेढ़राज जी, स्व. नागरमल जी, स्व. श्री महावीर प्रसाद कलानोरिया, स्व. श्री हरिशचन्द्र अग्रवाल, स्व. श्री डालूराम अग्रवाल, स्व. शेर सिंग, स्व. श्री दयाराम अग्रवाल, स्व. श्री ओमप्रकाश केडिया ने भी समाजसेवा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अग्र समाज की इन महान विभूतियों के अलावा आज समाज के अनेक महानुभाव एवं युवा अनेक संगठनों, राजनैतिक दलों के माध्यम से जनसेवा में जुटे हैं जिनमें रामस्वरूप रतेरिया, रामकुमार अग्रवाल (वकील), वासुदेव मोदी, रामदास अग्रवाल, गणेशकुमार जगतरामका, सारंगढ़ के नंदकिशोर अग्रवाल, राजेन्द्र अग्रवाल चेंबर, संतोष राय, संतोष अग्रवाल अंतरंग, संतोष अग्रवाल (दयाराम), अजय रतेरिया, गोपादास गुप्ता, सागरमल अग्रवाल, उमेश अग्रवाल, बजरंग अगव्राल खरसिया, बाबूलाल अग्रवाल, विजय अग्रवाल (किरोड़Þीमल) बजरंग महमिया, सुशील मिततल, अनिल अग्रवाल (चीकू) मुकेश मित्तल, पुरूषोत्तम अग्रवाल, प्रमोद (चरक),सुरेश गोयल (पूर्व सभापति), प्रदीप गर्ग, अनिल रतेरिया, सुनील अग्रवाल लेन्ध्रा, सुनील रामदास, रमेश छपारिया, विकास केडिया, अशोक अग्रवाल (गेरवानी), अनूप रतेरिया, रमेश बंसल, सुषमा डालमिया, गोपाल अग्रवाल, लता सांवड़िया, सुधा अग्रवाल, रेखा महमिया, सरिता रतेरिया, कविता बेरीवाल, बबीता अग्रवाल, किरण अग्रवाल, ललिता गोयल, संगीता अग्रवाल, आशा बेरीवाल, चम्पा अग्रवाल, राखी नहाड़िया प्रमुख हैं।
नोट- यह आलेख मेरे द्वारा अपनी याददाश्त के आधार पर लिखा गया है। इसमें यदि कोई त्रुटि हो या किसी महानुभाव का नाम भूलवष छूट गया हो तो क्षमा प्रार्थी हूं।
मुरारी गुप्ता
रायगढ़ (छ.ग.)